झारखंड में बालू संकट गहराया: 229 घाटों का टेंडर पूरा, फिर भी वैध उठाव ठप — अवैध खनन से रोज़ 6 करोड़ का नुकसान

लीज डीड लंबित, NGT की आगामी रोक का खतरा; बाजार में दोगुनी कीमत पर बिक रहा बालू, निर्माण कार्य प्रभावित

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रांची: झारखंड में बालू संकट लगातार गहराता जा रहा है। राज्य के 16 जिलों में स्थित 229 बालू घाटों का टेंडर छह महीने पहले ही पूरा हो चुका है, लेकिन अब तक इन घाटों से वैध बालू उठाव शुरू नहीं हो पाया है। इसका सीधा फायदा अवैध बालू कारोबारियों को मिल रहा है, जो नियमों को ताक पर रखकर नदियों से बालू निकालकर खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं।

इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक बात यह है कि राज्य सरकार को प्रतिदिन लगभग 6 करोड़ रुपये की रॉयल्टी का नुकसान हो रहा है। वहीं आम उपभोक्ताओं और निर्माण कार्य से जुड़े लोगों को महंगे दाम पर बालू खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

कीमतों में जबरदस्त उछाल, आम लोगों पर असर:

बालू घाटों का संचालन शुरू नहीं होने से बाजार में कीमतें बेकाबू हो गई हैं। पहले जहां एक ट्रैक्टर बालू 2000 से 2500 रुपये में मिल जाता था, अब उसकी कीमत बढ़कर 6000 से 7000 रुपये तक पहुंच गई है।

इसी तरह एक हाइवा बालू की कीमत 25 हजार से बढ़कर 35 हजार रुपये तक हो गई है। इससे न केवल आम लोग प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि छोटे-बड़े निर्माण कार्य भी ठप पड़ने की कगार पर हैं।

लीज डीड बना सबसे बड़ा रोड़ा:

बालू घाट चालू नहीं होने के पीछे सबसे बड़ी वजह लीज डीड का लंबित होना है। जिला प्रशासन द्वारा लीज डीड की प्रक्रिया पूरी नहीं किए जाने के कारण घाट संचालक आगे की आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी नहीं कर पा रहे हैं।

लीज डीड के अभाव में संचालक सीटीओ (कंसेंट टू ऑपरेट) के लिए आवेदन नहीं दे पा रहे हैं, जिससे वैध खनन की प्रक्रिया पूरी तरह अटकी हुई है।

पेसा कानून और पर्यावरणीय मंजूरी से बढ़ी देरी:

अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून के तहत ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है, जिसके कारण प्रक्रिया और लंबी हो रही है। इसके अलावा टेंडर के बाद पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) और माइनिंग प्लान की मंजूरी में विभागीय सुस्ती भी देरी का कारण बनी हुई है।

NGT की रोक से और बढ़ेगी समस्या:

हर साल 10 जून से 15 अक्टूबर तक मॉनसून के दौरान राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा बालू उठाव पर रोक लगा दी जाती है। ऐसे में अगर जल्द ही वैध उठाव शुरू नहीं हुआ, तो आने वाले पांच महीनों तक बालू की किल्लत और अधिक गहरा सकती है।

सरकार को मिल सकता है बड़ा राजस्व:

राज्य में 229 बालू घाटों के संचालन शुरू होने पर सरकार को एकमुश्त 473 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हो सकती है। इसके अलावा प्रति वर्ष लगभग 2000 करोड़ रुपये की रॉयल्टी मिलने का अनुमान है।

अधिकारियों का दावा — जल्द शुरू होगा उठाव:

खान विभाग के अधिकारियों का कहना है कि लंबित तकनीकी प्रक्रियाओं को जल्द पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। जिन घाटों की पर्यावरणीय मंजूरी लंबित है, उन पर राज्य स्तरीय विशेषज्ञ समिति काम कर रही है।

वहीं जिला प्रशासन ने भी सभी लंबित मामलों की समीक्षा शुरू कर दी है और प्रयास किया जा रहा है कि जल्द से जल्द बालू घाटों का संचालन शुरू किया जाए।

झारखंड में बालू संकट केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक चुनौती बन चुका है। अवैध खनन जहां सरकार को भारी नुकसान पहुंचा रहा है, वहीं आम जनता और निर्माण क्षेत्र पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार और प्रशासन कब तक इस समस्या का ठोस समाधान निकाल पाते हैं।

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